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धान फसल में कीट-व्याधि की नियमित निगरानी करें किसान कृषि विज्ञान केंद्र भाटापारा के वैज्ञानिकों ने समय पर पहचान और वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने की दी सलाह

ByAshok Mishra

Sep 15, 2026

बलौदाबाजार, 13 सितम्बर 2026। खरीफ सीजन में खेतों में पर्याप्त नमी और अनुकूल वातावरण के कारण धान की फसल में विभिन्न कीट एवं रोगों के प्रकोप की आशंका बढ़ गई है। इसे देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र भाटापारा के वैज्ञानिकों ने जिले के किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने तथा कीट-रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही वैज्ञानिक एवं अनुशंसित प्रबंधन उपाय अपनाने की सलाह दी है।

वैज्ञानिकों ने किसानों से कहा है कि धान के पत्तों, तनों और पौधों की बढ़वार का अलग-अलग स्थानों से सूक्ष्म निरीक्षण करें। केवल खेत के एक स्थान पर खड़े होकर फसल का जायजा लेने के बजाय खेत के विभिन्न हिस्सों में जाकर निगरानी करना अधिक प्रभावी रहेगा।

तना छेदक कीट से सावधान

तना छेदक कीट की सुंडी धान के तने में प्रवेश कर अंदर के हिस्से को नुकसान पहुंचाती है। फसल की अवस्था के अनुसार ‘डेड हार्ट’ तथा बालियां निकलने के बाद ‘व्हाइट ईयर’ जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। किसानों को सूखे केंद्रीय तनों एवं असामान्य रूप से सूख रहे पौधों पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी गई है।

पत्ती मोड़क एवं पत्ती लपेटक की पहचान जरूरी

पत्ती मोड़क अथवा पत्ती लपेटक कीट की सुंडियां धान की पत्तियों को मोड़कर या लपेटकर उनके अंदर छिप जाती हैं और पत्ती के हरे भाग को खुरचकर खाती हैं। इससे पत्तियों पर सफेद धारियां अथवा झिल्ली जैसे लंबे निशान दिखाई देते हैं। अधिक प्रकोप होने पर पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

अधिक प्रकोप की स्थिति में कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर अथवा क्लोरेंट्रानिलीप्रोल 150 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

गंगई के लक्षणों की करें निगरानी

धान में गंगई के प्रकोप से नई बढ़वार प्रभावित होती है। संक्रमित पौधों में सामान्य पत्ती के स्थान पर लंबी, पतली नलीनुमा संरचना दिखाई दे सकती है, जिसे सामान्यतः सिल्वर शूट अथवा प्याज पत्ती के लक्षण के रूप में पहचाना जाता है। इससे बालियों का विकास भी प्रभावित हो सकता है। लक्षण दिखाई देने पर फिप्रोनिल 5 प्रतिशत ईसी 1000 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर उपयोग करने की सलाह दी गई है।

भूरा माहू के प्रकोप पर विशेष ध्यान

भूरा माहू पौधों के निचले हिस्से में रहकर रस चूसता है। किसानों को पौधों के तने के निचले हिस्से तथा पानी की सतह के आसपास विशेष निगरानी करनी चाहिए। अधिक प्रकोप में पौधे कमजोर और पीले पड़ने लगते हैं तथा पौधों के समूह तेजी से सूखने लगते हैं। इस स्थिति को ‘हॉपर बर्न’ कहा जाता है।

वैज्ञानिकों ने भूरा माहू के नियंत्रण के लिए ब्यूप्रोफेजिन 25 प्रतिशत एससी 800 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर अथवा पाइमेट्रोजिन 50 डब्ल्यूजी के उपयोग की सलाह दी है। साथ ही खेत में अनावश्यक रूप से अत्यधिक उर्वरक के प्रयोग से बचने और नियमित निगरानी करने को कहा गया है।

कृषि वैज्ञानिकों का संदेश है कि कीट एवं रोगों की पहचान जितनी जल्दी होगी, फसल को नुकसान से बचाने की संभावना उतनी ही अधिक रहेगी। किसान प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उचित प्रबंधन करें।

चाणक्य न्यूज़ इंडिया
हिमांशु शुक्ला, बलौदा बाजार-भाटापारा

By Ashok Mishra

Ashok Mishra is the Editor-in-Chief of Chanakya News India, a Hindi digital news platform established in 2012. The organization focuses on delivering verified breaking news, live news coverage, crime, entertainment, business, technology, and regional updates across India. Address: FNG vihar 2 sector 121 Gautam budhnagar Uttar pradesh, India Email -mpcgchanakyanewsindia@gmail.com Phone– +91 9315744968

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