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*आद्य रामानंदाचार्य का समरसता के प्रति साहसिक उद्घोष ही एकता का सूत्र : श्री भगवान वेदांताचार्य*
दमोह……जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी का एक अनोखा, राष्ट्रहितकारी समर्पण यह था कि उन्होंने भक्ति को केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित न रखकर समाज-सुधार और सांस्कृतिक एकता का माध्यम बनाया। यह उद्गार काशी स्थित सभा के मध्य श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी के मुखारविंद से आविर्भूत हुए जहां
भारतीय चेतना के वह उज्ज्वल दीप कहलाए , जिसकी ज्योति केवल साधना-कक्ष तक सीमित न रहकर समूचे राष्ट्र-प्रांगण को आलोकित करती है। उन्होंने भक्ति को आत्मोद्धार का साधन मात्र नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज-निर्माण और राष्ट्र-चेतना की सशक्त धारा में प्रवाहित किया।
जिस युग में संस्कृत की गरिमा शास्त्रों तक सिमटी हुई थी, उस समय उन्होंने लोकभाषा को धर्म का वाहन बनाकर जन-जन के हृदय में रामतत्त्व की प्रतिष्ठा करते हुए यह भाषिक अर्थात भाषा से ऊपर साहसिक कदम जिसमें सभी भाषाएं सीमित न रही भारतीय सांस्कृतिक लोकतंत्र का प्रथम घोष किया । उनके लिए राम केवल आराध्य नहीं, बल्कि मर्यादा, न्याय और करुणा के सजीव आदर्श थे,
ऐसे आदर्श जिन पर एक सुदृढ़ राष्ट्र की नींव रखी जाती है।
रामानंदाचार्य जी की परंपरा में भक्ति ने समरसता का रूप धारण किया। जाति, कुल और सामाजिक भेद उनके लिए अर्थहीन थे।
*हरि को भजे जो हरि का होई* कबीर, रैदास और पपिहा , धन्ना जैसे 12 शिष्यों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि आध्यात्मिक ऊँचाई जन्म से नहीं, चरित्र और चेतना से मापी जाती है। यह दृष्टि भारतीय समाज को जोड़ने वाली सेतु बनी।
उनका वैराग्य लोकविमुख नहीं था; वह करुणा से ओतप्रोत लोकमंगल की साधना थी। तीर्थ, नगर और ग्राम उनके उपदेशों से अनुप्राणित हुए और उत्तर भारत की भूमि पर वैष्णव चेतना की ऐसी जड़ें पड़ीं, जिन्होंने संकट काल में भी भारतीय आत्मा को अक्षुण्ण रखा।
प्रयाग राज में उनके जन्म के 726 वर्ष हुए है जहां काशी की पवन धरा उनकी कर्तव्य भूमि में आयोजित सभा में शामिल जगत गुरु रामकमलाचार्य, महंत श्रवण दास महंत मोहन दास महंत सिया राम दास सहित वैष्णव विरक्त संत समाज के प्रतिनिधित्व करते हुए श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी का उद्बोधन करते हुए सम्मान किया यह एक दिवसीय और द्वय आध्यात्मिक नगरों में एक साथ प्रदीप्त होती हुई ऐतिहासिक उपलब्धि की झलक है जो बुंदेलखंड का स्वर्णिम इतिहास गढ़ रहा है ।
