जिला ब्यूरो राजेंद्र विश्वकर्मा
लटेरी | क्षेत्र में अवैध शराब का कारोबार और ओवररेट बिक्री अब एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद का रूप ले चुकी है। कांग्रेस नेता नीरज अग्रवाल के साथ हुई अभद्रता के बाद शुरू हुआ यह मामला अब आबकारी विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
विवाद की जड़: ओवररेट बिक्री और अभद्रता
मामले की शुरुआत तब हुई जब कांग्रेस नेता नीरज अग्रवाल ने क्षेत्र में शराब की तय कीमतों से अधिक वसूली की शिकायतों पर मोर्चा खोला। मौके पर विरोध करने पहुंचे अग्रवाल के साथ ठेकेदार के कर्मचारियों ने न केवल बदतमीजी की, बल्कि विवाद को हिंसक मोड़ दे दिया।
राजनीतिक विरोध: घटना के बाद वरिष्ठ कांग्रेस नेता यदुवीर सिंह के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने जोरदार धरना-प्रदर्शन किया।
कानूनी कार्रवाई: नीरज अग्रवाल की शिकायत पर पुलिस ने FIR दर्ज की है। फिलहाल एक आरोपी जेल में है, जबकि दो अन्य फरार हैं।
आबकारी विभाग की ‘रहस्यमयी’ कार्यप्रणाली
जब जनता और विपक्ष का दबाव बढ़ा, तो आबकारी विभाग हरकत में तो आया, लेकिन उनकी कार्यशैली ने पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए।
गोपनीय सीलिंग: विभाग की टीम ने बिना किसी पूर्व सूचना या स्थानीय तालमेल के मदनखेड़ी चौराहे स्थित शराब दुकान को ‘चुपचाप’ सील कर दिया।
खानापूर्ति का आरोप: टीम लटेरी की मुख्य दुकान पर भी पहुंची, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार वहां केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी की गईं और कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
अधिकारियों की चुप्पी: मीडिया ने जब जिला आबकारी अधिकारी पुष्पेंद्र ठाकुर से स्पष्टीकरण मांगा, तो वे कैमरे और सवालों से बचते नजर आए। फोन पर भी उनसे संपर्क नहीं हो सका।
जनता के बीच उठते कुछ तीखे सवाल
क्षेत्र में चर्चा है कि क्या यह कार्रवाई केवल जनाक्रोश को शांत करने के लिए एक ‘दिखावा’ है?
“क्या आबकारी विभाग और शराब माफिया के बीच कोई सांठगांठ है? यदि कार्रवाई नियमानुसार थी, तो उसे इतना गुप्त क्यों रखा गया और मुख्य दुकान पर नरमी क्यों बरती गई?” — स्थानीय नागरिक
प्रमुख बिंदु वर्तमान स्थिति
अवैध सप्लाई गांव-गांव तक अवैध शराब की पहुंच की खबरें।
कीमतें प्रिंट रेट से अधिक वसूली जारी।
पुलिस कार्रवाई एक आरोपी गिरफ्तार, दो अभी भी पुलिस की पकड़ से बाहर।
विभागीय रुख सवालों से बच रहे जिम्मेदार अधिकारी।निष्कर्ष: ठोस कार्रवाई या ठंडे बस्ते की तैयारी?
लटेरी की जनता अब केवल ‘दिखावे की सीलिंग’ से संतुष्ट नहीं है। लोग अब एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था की मांग कर रहे हैं जहां शराब माफिया का आतंक खत्म हो और सरकारी नियमों का पालन हो। यदि प्रशासन ने जल्द ही स्पष्ट और कठोर कदम नहीं उठाए, तो यह आंदोलन उग्र रूप ले सकता है।
अब देखना यह है कि क्या शासन के आला अधिकारी इस ‘मिलीभगत’ के खेल पर संज्ञान लेंगे या मामला फिर से ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
