वन विभाग की रायपुर रेंज में सागर से चल रहा हरा-सोना लूटो अभियान
642 पेड़ों का अवैध पाटण, 79 पर ही कार्रवाई, आरटीआई में हुआ बड़ा खुलासा
वन विभाग के पास भी वैज्ञानिक रिपोर्टें आज उपलब्ध नहीं हैं
दवा। राजधानी से सटे रायपुर रेंज, मसूरी वन क्षेत्र के जंगलों में पिछले 22 वर्षों के दौरान बड़े पैमाने पर अवैध पाटन हुआ, लेकिन वन विभाग की कार्रवाई प्रशासन के दायरे में है। सूचना अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2004 से जून 2026 तक रायपुर रेंज, मसूरी वन क्षेत्र के विभिन्न वन क्षेत्रों में 642 पेड़ों और कांपियों का अवैध पाटन दर्ज किया गया। इसके बावजूद केवल 79 के खिलाफ दर्ज किए गए, जबकि कई मामले आज तक नहीं मिले हैं।
यह जानकारी रायपुर रेंज, मसूरी वन क्षेत्र के लोक सूचना अधिकारी आरटीआई आवेदन के उत्तर में उपलब्ध कराई गई है। आर्टिएक्टिव एक्टिविस्ट मनीष कुमार सहगल द्वारा दी गई जानकारी में वन अपराध और सामने आई कार्रवाई का विस्तृत उत्पाद सामने आया है।
वन विभाग के रिकार्ड के अनुसार रायपुर रेंज, मसूरी वन क्षेत्र के जौहरी, सिनोला, मालदेवता, चंद्रोटी, बिश्तागांव, फुलकोट, गुनियाल गांव और किमाड़ी सहित कई क्षेत्रों में अवैध रूप से पेड़ों की कटाई की गई। इन सभी आंकड़ों में कुल मिलाकर 642 पेड़ों का अवैध विवरण दर्ज किया गया है। इसमें ऑटोमोबाइल की वैश्विक दृष्टि से सबसे आकर्षक वन पट्टियाँ शामिल मानी जाती हैं। यहां के जंगल न केवल शहर के जल संरक्षण को संरक्षित करते हैं बल्कि महत्वों के प्राकृतिक आवास भी हैं।
आरटीआई के जवाब में वन विभाग ने बताया कि अवैध पाटन के मामलों में 79 वैध पंजीकृत हैं। हालांकि सबसे ज्यादा डेट करने वाली बात यह है कि विभाग ने भी इसे स्वीकार कर लिया है कि रिपोर्टर्स की रिसर्चर्स के कार्यालय में यह उपलब्ध नहीं है। यानी जिन मामलों में कार्रवाई हुई, उनके महत्वपूर्ण दस्तावेज भी सुरक्षित नहीं रहे। इससे संबंधित रिज़र्व रिकार्ड प्रबंधन और एक्शन की दुकान पर गंभीर प्रश्न पूछे गए हैं।
इसके साथ ही वन विभाग के अनुसार अवैध पाटन से जुड़े कुल 53 वन अपराध दर्ज किये गये। इनमें से 30 मामलों में से एक कोर्ट में सोलोमन हो चुका है और 23 मामले अभी भी अलग-अलग कमरों में हैं। यानी करीब-करीब मामले वर्षों बाद भी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके हैं। आरती से सामने आए आंकड़े कई गंभीर सवाल करते हैं। यदि 22 वर्षों में 642 पेड़ों का अवैध पतन हुआ तो क्या वन विभाग समय रहते इन घटनाओं को रोक में विफल रहा? अवैध कटान करने वाले सभी लोगों तक क्या कार्रवाई की जाएगी? यदि नहीं तो बाकी जिम्मेदार लोगों का क्या हुआ? और जिन मामलों के दस्तावेज तक सुरक्षित नहीं हैं, उनका प्लाज़्म कौन तय करेगा? वन विभाग की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी इन चित्रों का उत्तर नहीं।
बता दें कि रायपुर रेंज, मसूरी वन विभाग के जंगल काॅलेज की हरित पट्टी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। विशेषज्ञ के अनुसार पौधों की अवैध कटाई से पौधे के स्तर, जैव विविधता और पत्थरों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही सामान और मांसपेशियां कटाव जैसी विशेषताएं भी बढ़ सकती हैं। सरकार एक तरफ वन संरक्षण और हरित विकास का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर दूसरी ओर आरती के आंकड़े सामने आए हैं कि दो दशकों में सैकड़ों पेड़ों का अवैध पाटन हुआ और कई मामलों में कार्रवाई आज भी अधूरी है। यह स्थिति वन विभाग की पर्यवेक्षण व्यवस्था, रिकार्ड प्रबंधन और कानून के प्रभावशाली वैज्ञानिक पर गंभीर प्रश्न श्रृखंला लगाती है।
अंधा कानून, बहरा महककमा
642 पेड़ों की लाशों पर बैठकर सालों से पिकनिक मना रहे वन विभाग की रायपुर रेंज के अफसर वन विभाग की रायपुर रेंज में सालों से चल रहा हरा-सोना लूटो अभियान 642 पेड़ों का अवैध पातन, 79 पर ही कार्रवाई, आरटीआई में हुआ बड़ा खुलासा चालानी रिपोर्टों की प्रतिलिपियां भी वन विभाग के पास नहीं है आज उपलब्ध देहरादून। राजधानी देहरादून से सटे रायपुर रेंज, मसूरी वन प्रभाग के जंगलों में पिछले 22 वर्षों के दौरान बड़े पैमाने पर अवैध पातन हुआ, लेकिन वन विभाग की कार्रवाई सवालों के घेरे में है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2004 से जून 2026 तक रायपुर रेंज, मसूरी वन प्रभाग के विभिन्न वन क्षेत्रों में 642 पेड़ों और कांपिस का अवैध पातन दर्ज किया गया। इसके बावजूद केवल 79 के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए, जबकि कई मामलों का निस्तारण आज तक नहीं हो पाया है।यह जानकारी रायपुर रेंज, मसूरी वन प्रभाग के लोक सूचना अधिकारी द्वारा आरटीआई आवेदन के जवाब में उपलब्ध कराई गई है। आरटीआई कार्यकर्ता मनीष कुमार सहगल द्वारा मांगी गई जानकारी में वन अपराधों और उन पर हुई कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा सामने आया है। वन विभाग के रिकार्ड के अनुसार रायपुर रेंज, मसूरी वन प्रभाग के जौहड़ी, सिनोला, मालदेवता, चन्द्रोटी, बिष्टगांव, फुफलकोट, गुनियाल गांव और किमाड़ी सहित कई क्षेत्रों में अवैध रूप से पेड़ों की कटाई की गई। इन सभी क्षेत्रों को मिलाकर कुल 642 पेड़ों का अवैध पातन दर्ज किया गया है। यह इलाका देहरादून की पर्यावरणीय दृष्टि से सबसे संवेदनशील वन पटिृयों में शामिल माना जाता है। यहां के जंगल न केवल शहर के जल स्रोतों को संरक्षित करते हैं बल्कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास भी हैं।आरटीआई के जवाब में वन विभाग ने बताया कि अवैध पातन के मामलों में 79 के खिलाफ वाद पंजीकृत किए गए हैं। हालांकि सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि विभाग ने यह भी स्वीकार किया है कि चालानी रिपोर्टों की प्रतिलिपियां उसके कार्यालय में उपलब्ध नहीं हैं। यानी जिन मामलों में कार्रवाई हुई, उनके महत्वपूर्ण दस्तावेज भी सुरक्षित नहीं रखे गए हैं। इससे विभागीय रिकार्ड प्रबंधन और कार्रवाई की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।इसके साथ ही वन विभाग के अनुसार अवैध पातन से जुड़े कुल 53 वन अपराध दर्ज किए गए। इनमें से 30 मामलों का न्यायालय में निस्तारण हो चुका है और 23 मामले अभी भी विभिन्न स्तरों पर लंबित हैं। यानी लगभग आधे मामले वर्षों बाद भी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके हैं। आरटीआई से सामने आए आंकड़े कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। यदि 22 वर्षों में 642 पेड़ों का अवैध पातन हुआ तो क्या वन विभाग समय रहते इन घटनाओं को रोकने में विफल रहा? क्या अवैध कटान करने वाले सभी लोगों तक कार्रवाई पहुंची? यदि नहीं तो बाकी जिम्मेदार लोगों का क्या हुआ? और जिन मामलों के चालान तक सुरक्षित नहीं हैं, उनकी जवाबदेही कौन तय करेगा? वन विभाग की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी इन सवालों का जवाब नहीं देती।बता दें कि रायपुर रेंज, मसूरी वन प्रभाग के जंगल देहरादून की हरित पट्टी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। विशेषज्ञों के अनुसार लगातार पेड़ों की अवैध कटाई से भूजल स्तर, जैव विविधता और वन्यजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही भूस्खलन और मृदा कटाव जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं। सरकार एक ओर वन संरक्षण और हरित विकास के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर आरटीआई से सामने आए आंकड़े बताते हैं कि दो दशकों में सैकड़ों पेड़ों का अवैध पातन हुआ और अनेक मामलों में कार्रवाई आज भी अधूरी है। यह स्थिति वन विभाग की निगरानी व्यवस्था, रिकार्ड प्रबंधन और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
