मामले के अनुसार, याचिका में सीनियर सेक्शन इंजीनियर (वर्क्स), नॉर्दर्न रेलवे, देहरादून द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी गई, याचिकाकर्ताओं ने मसूरी के झड़ीपानी में स्थित संपत्ति पर अपना मालिकाना हक का दावा किया, विवादित नोटिस में रेलवे की जमीन पर कथित तौर पर कब्जा करने वाले लोगों को जमीन खाली करने का नोटिस दिया गया, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नोटिस उनके घरों पर लगाया गया और उनसे उक्त भूमि को निर्धारित समय के भीतर खाली करने को कहा है, जबकि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया गया है।
कोर्ट ने कहा कि, स्थापित कब्जे से बेदखली केवल अदालत के आदेश के बाद ही की जा सकती है और कानून की उचित प्रक्रिया का पालन तभी माना जाता है, जब सक्षम अदालत द्वारा पक्षों को सुना हो और सही गलत का अवलोकन किया हो और फिर बेदखली का फैसला दिया हो।
कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि ‘कानूनी मंजूरी के बिना किसी व्यक्ति को अचल संपत्ति से जबरदस्ती बेदखल करना संवैधानिक और मानवाधिकारों, दोनों का उल्लंघन है, कानून यह अनिवार्य करता है कि स्थापित कब्जे वाले किसी घुसपैठिए या किराएदार को भी जबरदस्ती नहीं हटाया जा सकता, जमीन के मालिक को सक्षम अदालत से आदेश प्राप्त करना होगा और स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
कोर्ट ने पाया कि, विवादित नोटिस किसी कानूनी प्रक्रिया के तहत जारी नहीं किया गया और दोहराया कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना गैर, कानूनी कब्जा करने वाले व्यक्ति को भी संपत्ति से नहीं हटाया जा सकता, कोर्ट ने कहा कि, याचिकाकर्ताओं को तीस दिनों के भीतर जमीन खाली करने का निर्देश देने वाला प्रशासनिक नोटिस कानून की नजर में मान्य नहीं हो सकता।
कोर्ट ने रेलवे के द्वारा दिए गए नोटिस को निरस्त करते हुए यह स्पष्ट किया कि रेलवे गैर-कानूनी कब्जे में पाए गए लोगों के खिलाफ कानून का अनुपालन करते हुए उचित कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।
#Nainital #UttarakhandHighCourt #HighCourt #Railway #IndianRailways #CourtOrder #विवेक त्रिपाठी स्टेट हेड। #चाणक्य न्यूज इंडिया #उत्तराखंड
