• Wed. Aug 12th, 2026

Chanakya News India

News Broadcast Live TV

सरहद की कहानी: सीमा के प्रहरी, गांवों के हमसफ़र एक ओर खुली भारत-नेपाल सीमा पर तस्करी और अवैध गतिविधियों के खिलाफ चौकसी, दूसरी ओर दुर्गम गांवों तक निःशुल्क चिकित्सा, पर्यावरण संरक्षण और बच्चों में राष्ट्रभाव जगाने की पहल—71वीं वाहिनी SSB ने सुरक्षा के साथ सेवा और विश्वास की भी बनाई पहचान

ByAshok Mishra

Aug 12, 2026

श्यामल प्रतीक | रक्सौल अनुमंडल रिपोर्टर
चाणक्य न्यूज़ इंडिया

मोतिहारी। सरहद की कहानी केवल सीमा स्तंभों, चौकियों और गश्त करते जवानों की कहानी नहीं है। सरहद की एक दूसरी तस्वीर भी है—जहां वर्दी में खड़ा जवान देश की सीमा की निगहबानी करने के साथ उन गांवों और परिवारों से भी जुड़ता है, जिनकी जिंदगी इसी सीमा के आसपास बसती है।

भारत-नेपाल की खुली सीमा पर तैनात 71वीं वाहिनी सशस्त्र सीमा बल (SSB), मोतिहारी की गतिविधियों में यही दोहरी भूमिका दिखाई देती है। एक तरफ जवान तस्करी एवं अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए सीमा पर लगातार मुस्तैद रहते हैं, तो दूसरी तरफ सीमावर्ती गांवों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और जनजागरूकता से जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीणों के बीच पहुंचते हैं।

इस पूरी पहल की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी वे गांव हैं, जहां चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच आसान नहीं है।

जहां अस्पताल की पहुंच मुश्किल, वहां गांव तक पहुंचती चिकित्सा

10 अगस्त 2026 को 71वीं वाहिनी के कमांडेंट प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन में बाह्य सीमा चौकी जलगाँवा के कार्यक्षेत्र अंतर्गत VVP-II धरम नगर में मानव चिकित्सा शिविर आयोजित किया गया।

शिविर में डॉ. राजेश कुमार, कमांडेंट (चिकित्सा) द्वारा सीमावर्ती ग्रामीणों की स्वास्थ्य जांच की गई। जरूरतमंद लोगों को चिकित्सकीय परामर्श, उपचार और आवश्यक दवाएं पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध कराई गईं।

सीमावर्ती क्षेत्रों में ऐसे शिविरों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि कई गांवों में चिकित्सा सुविधाओं तक तत्काल पहुंच आसान नहीं होती। ऐसे में SSB द्वारा गांवों के करीब चिकित्सा शिविर आयोजित किए जाने से ग्रामीणों को बिना किसी शुल्क के स्वास्थ्य जांच और दवाओं का सीधा लाभ मिलता है।

यह केवल दवा बांटने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर रहने वाले लोगों तक चिकित्सा पहुंचाने का प्रयास है।

दवा के साथ जिंदगी बचाने की सीख

धरम नगर में ग्रामीणों को CPR (Cardiopulmonary Resuscitation) के महत्व और आपात स्थिति में इसकी भूमिका के बारे में भी जागरूक किया गया।

साथ ही लोगों से अपने घर और आसपास स्वच्छता बनाए रखने तथा जलजमाव नहीं होने देने की अपील की गई, ताकि डेंगू और मलेरिया जैसी मच्छर जनित बीमारियों से बचाव किया जा सके।

ग्रामीणों को अपने दैनिक आहार में पोषक तत्वों से भरपूर श्री अन्न यानी मोटे अनाज शामिल करने और उसके स्वास्थ्य लाभों की जानकारी भी दी गई।

इस तरह शिविर में बीमारी के उपचार के साथ-साथ बीमारी से बचाव और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पर भी जोर दिया गया।

एक तरफ सरहद की चौकसी, दूसरी तरफ गांव की चिंता

भारत और नेपाल की खुली सीमा दोनों देशों के ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्तों की महत्वपूर्ण कड़ी है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही वाली इस सीमा की प्रकृति सुरक्षा के लिहाज से कई चुनौतियां भी प्रस्तुत करती है।

तस्करी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए SSB के जवान लगातार निगरानी, गश्त और जांच में जुटे रहते हैं।

लेकिन सीमा की सुरक्षा केवल अवैध गतिविधियों को रोकने तक सीमित नहीं है। सीमा पर रहने वाले नागरिकों और सुरक्षा बलों के बीच विश्वास तथा संवाद भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यही कारण है कि 71वीं वाहिनी सुरक्षा की अपनी मूल जिम्मेदारी के साथ सीमावर्ती समाज तक सामाजिक सरोकारों के माध्यम से भी पहुंच रही है।

बच्चों को दिखाई जाती है सीमा सुरक्षा की असली दुनिया

71वीं वाहिनी द्वारा सीमावर्ती विद्यालयों के बच्चों को समय-समय पर सीमा क्षेत्र और सुरक्षा बलों की कार्यप्रणाली से परिचित कराने के लिए भ्रमण एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं।

इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को बताया जाता है कि देश की सीमाओं की सुरक्षा कैसे की जाती है, जवान किन परिस्थितियों में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं और राष्ट्र की सुरक्षा में नागरिकों की क्या भूमिका हो सकती है।

किताबों में देश की सरहद के बारे में पढ़ने वाले बच्चों के लिए जब सीमा और उसके प्रहरी सामने होते हैं, तो राष्ट्रसेवा और कर्तव्य का अर्थ अधिक जीवंत हो जाता है।

नन्हे हाथों में पौधे, भविष्य के लिए हरियाली का संदेश

71वीं वाहिनी की सामाजिक पहलों में पर्यावरण संरक्षण भी शामिल रहा है।

सीमावर्ती क्षेत्रों में बच्चों को पौधारोपण से जोड़ने और पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जाता रहा है। विद्यार्थियों के हाथों पौधे लगवाकर उन्हें यह संदेश दिया जाता है कि प्रकृति की रक्षा भी आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक जिम्मेदारी है।

आज लगाया गया एक पौधा आने वाले वर्षों में केवल पेड़ नहीं बनता, बल्कि उस बच्चे के भीतर पर्यावरण के प्रति पैदा हुई जिम्मेदारी का प्रतीक भी बन सकता है।

राष्ट्रभाव, स्वच्छता और ग्रामीण संवाद

‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर भी 71वीं वाहिनी द्वारा सीमावर्ती विद्यालयों में विद्यार्थियों और ग्रामीणों को जोड़ते हुए कार्यक्रम आयोजित किए गए। ‘हर घर तिरंगा’, स्वच्छता, शिक्षा और राष्ट्रीय एकता जैसे विषयों पर जागरूकता का संदेश दिया गया।

इसके अलावा विलेज मीटिंग जैसे कार्यक्रमों के जरिए सीमावर्ती ग्रामीणों से सीधा संवाद स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। ऐसे संवाद सुरक्षा बल और स्थानीय समाज के बीच विश्वास बढ़ाने की महत्वपूर्ण कड़ी बनते हैं।

कमांडेंट प्रफुल्ल कुमार की देखरेख में सुरक्षा से सेवा तक

71वीं वाहिनी की इन गतिविधियों का संचालन कमांडेंट प्रफुल्ल कुमार की देखरेख और निर्देशन में किया जा रहा है।

सीमा पर चौकसी के साथ चिकित्सा शिविर, बच्चों के भ्रमण और जागरूकता कार्यक्रम, पर्यावरण संरक्षण, पौधारोपण, स्वच्छता तथा ग्रामीणों से संवाद जैसी गतिविधियां यह बताती हैं कि सीमावर्ती क्षेत्र में सुरक्षा बल की भूमिका बहुआयामी हो सकती है।

इन प्रयासों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ग्रामीणों के बीच बनने वाला विश्वास है। किसी बुजुर्ग को गांव के पास निःशुल्क दवा मिलती है, किसी बच्चे को पहली बार सीमा सुरक्षा की वास्तविक जिम्मेदारी समझने का अवसर मिलता है और किसी विद्यार्थी के हाथों भविष्य के लिए एक पौधा लगाया जाता है—तो सुरक्षा बल और समाज के बीच एक अलग रिश्ता विकसित होता है।

यही है सरहद की दूसरी कहानी…

सरहद की एक तस्वीर वह है जहां जवान दिन-रात देश की निगहबानी करता है। दूसरी तस्वीर उसी सरहद के गांव की है, जहां वही वर्दी कभी स्वास्थ्य का संदेश लेकर पहुंचती है, कभी बच्चों को राष्ट्र और कर्तव्य से जोड़ती है और कभी उनके हाथों में पौधा देकर पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी सौंपती है।

धरम नगर में किसी ग्रामीण के हाथ में मिली निःशुल्क दवा, किसी बच्चे के हाथ में लगा पौधा और सीमा चौकी पर मुस्तैद जवान—ये अलग-अलग तस्वीरें जरूर हैं, लेकिन इन सबको जोड़ने वाली डोर एक ही है: देश, सरहद और उसके लोगों के प्रति जिम्मेदारी।

शायद इसीलिए सीमावर्ती गांवों के लिए वे केवल सीमा के प्रहरी नहीं—गांवों के हमसफ़र भी हैं।

By Ashok Mishra

Ashok Mishra is the Editor-in-Chief of Chanakya News India, a Hindi digital news platform established in 2012. The organization focuses on delivering verified breaking news, live news coverage, crime, entertainment, business, technology, and regional updates across India. Address: FNG vihar 2 sector 121 Gautam budhnagar Uttar pradesh, India Email -mpcgchanakyanewsindia@gmail.com Phone– +91 9315744968

अन्य ख़बरें