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जन नायकन मूवी रिव्यू:विजय की आखिरी फिल्म पर राजनीति हावी, तीन घंटे का सफर बन गया थका देने वाला तमाशा

ByAshok Mishra

Jul 23, 2026
Rajinikanth, Kamal Haasan, Vijay And Others at the Nadigar Sangam Protest To Set Up The Cauvery Management Board

विजय की आखिरी फिल्म होने के कारण ‘जन नायकन’ सिर्फ एक रिलीज नहीं, बल्कि करोड़ों प्रशंसकों के लिए भावनात्मक मौका थी। उम्मीद थी कि यह फिल्म उनके लंबे सिनेमाई सफर को यादगार विदाई देगी। लेकिन निर्देशक एच. विनोथ इसे कहानी से ज्यादा राजनीतिक संदेश और स्टार की छवि चमकाने का माध्यम बना देते हैं।

नतीजा यह कि फिल्म कई बार मनोरंजन छोड़कर चुनावी भाषण जैसी लगने लगती है। विजय की मौजूदगी तालियां जरूर बटोरती है, लेकिन कमजोर पटकथा और जरूरत से ज्यादा लंबाई फिल्म का असर कम कर देती है। फिल्म की लंबाई 3 घंटे 3 मिनट है। दैनिक भास्कर ने फिल्म को 5 में से 2 स्टार दिए हैं।कहानी वेत्री (विजय) की है, जो जेल में बंद होने के बावजूद सब पर भारी पड़ता है। ईमानदार जेलर श्रीकांत (गौतम वासुदेव मेनन) उसकी इंसानियत पहचानता है, लेकिन एक हादसे के बाद अपनी बेटी विजी (ममिता बैजू) की जिम्मेदारी वेत्री को सौंप देता है। वेत्री उसे सेना में अधिकारी बनाने का सपना पूरा करने निकल पड़ता है।

दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय अपराधी जॉन हिमलर (बॉबी देओल) देश में हिंसा और अराजकता फैलाने की साजिश रच रहा है। पत्रकार कयाल (पूजा हेगड़े) भी इस कहानी का हिस्सा बनती हैं। शुरुआत में कहानी भावनात्मक लगती है, लेकिन जल्द ही महिला सशक्तिकरण, आतंकवाद, राजनीति, भ्रष्टाचार और सत्ता की लड़ाई जैसे कई मुद्दों का बोझ उठाने लगती है

इसके चलते मूल कहानी पीछे छूट जाती है। अंतराल के बाद फिल्म पूरी तरह बिखर जाती है और ऐसा लगता है कि हर दूसरा दृश्य सिर्फ विजय की छवि को और बड़ा बनाने के लिए लिखा गया है।

विजय हमेशा की तरह पूरे आत्मविश्वास के साथ नजर आते हैं। एंट्री, एक्शन, संवाद और स्क्रीन प्रेजेंस में उनका जलवा बरकरार है। लेकिन जब पटकथा ही कमजोर हो तो उनका स्टारडम भी फिल्म को ज्यादा दूर नहीं ले जा पाता। ममिता बैजू सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं और भावनात्मक दृश्यों में अपनी छाप छोड़ती हैं।

बॉबी देओल का खलनायक कागज पर जितना खतरनाक लगता है, पर्दे पर उतना असर नहीं छोड़ता। पूजा हेगड़े को करने के लिए बहुत कम मिला है। प्रकाश राज, नासर, प्रियामणि और गौतम वासुदेव मेनन जैसे कलाकार भी सीमित भूमिका में रह जाते हैं।एच. विनोथ ने एक मजबूत भावनात्मक कहानी को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की, लेकिन यही दांव सबसे कमजोर साबित होता है। पटकथा बार-बार भटकती है और कई दृश्य बिना किसी असर के गुजर जाते हैं। फिल्म को आसानी से आधा घंटा छोटा किया जा सकता था। विशेष प्रभाव कई जगह बड़े पर्दे के स्तर के नहीं लगते। चरम हिस्सा जरूरत से ज्यादा लंबा और थकाऊ है। सिनेमैटोग्राफी अच्छी है और कुछ दृश्य प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन कमजोर राइटिंग और ढीली एडिटिंग तकनीकी मेहनत पर भारी पड़ जाता है।

अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी है। गाने पहले से लोकप्रिय हैं और पार्श्व संगीत कई दृश्यों में जान डालता है। खासकर विजय की एंट्री और एक्शन वाले दृश्य संगीत की वजह से ज्यादा प्रभावशाली बनते हैं।

फाइनल वर्डिक्ट, देखें या नहीं? ‘जन नायकन’ अपने सबसे बड़े मकसद में ही चूक जाती है। यह न पूरी तरह दमदार राजनीतिक ड्रामा बन पाती है और न ही विजय को यादगार विदाई दे पाती है। विजय के प्रशंसकों के लिए इसमें तालियां बजाने लायक कई पल हैं, लेकिन एक दर्शक के तौर पर फिल्म निराश करती है। कमजोर कहानी, बिखरी पटकथा और बेवजह की लंबाई इसे साधारण बना देती है। विजय की विदाई इससे कहीं ज्यादा मजबूत और यादगार फिल्म की हकदार थी।

Rajinikanth, Kamal Haasan, Vijay And Others at the Nadigar Sangam Protest To Set Up The Cauvery Management Board

By Ashok Mishra

Ashok Mishra is the Editor-in-Chief of Chanakya News India, a Hindi digital news platform established in 2012. The organization focuses on delivering verified breaking news, live news coverage, crime, entertainment, business, technology, and regional updates across India. Address: FNG vihar 2 sector 121 Gautam budhnagar Uttar pradesh, India Email -mpcgchanakyanewsindia@gmail.com Phone– +91 9315744968