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कारकारगिल विजय श्रृंखला मेजर राजेश सिंह अधिकारी, महावीर चक्र (मरणोपरांत)गिल विजय श्रृंखला मेजर राजेश सिंह अधिकारी, महावीर चक्र (मरणोपरांत)

ByAshok Mishra

Aug 6, 2026

कारगिल विजय श्रृंखला

मेजर राजेश सिंह अधिकारी, महावीर चक्र (मरणोपरांत)

“तोलोलिंग की चोटी पर अमर हुआ नेतृत्व – एक ऐसे सेनानायक की गाथा जिसने अपने सैनिकों से पहले स्वयं मृत्यु का सामना किया”

विशेष कवर स्टोरी
कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से
लेखक: श्यामल प्रतीक
स्वतंत्र पत्रकार एवं सीमा मामलों के शोधकर्ता

भूमिका

भारत के सैन्य इतिहास में कुछ नाम केवल वीरता के प्रतीक नहीं, बल्कि नेतृत्व, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति की सर्वोच्च मिसाल बन जाते हैं। कारगिल युद्ध के ऐसे ही अमर नायकों में एक नाम है—मेजर राजेश सिंह अधिकारी।

1999 का कारगिल युद्ध केवल सीमाओं की रक्षा का संघर्ष नहीं था, बल्कि भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय स्वाभिमान और सैनिकों के अदम्य साहस की परीक्षा थी। इसी युद्ध में द्रास सेक्टर की रणनीतिक तोलोलिंग चोटी पर अपने सैनिकों का नेतृत्व करते हुए मेजर राजेश सिंह अधिकारी ने सर्वोच्च बलिदान दिया और भारतीय सेना के इतिहास में अमर हो गए।

तोलोलिंग – जहाँ से विजय का मार्ग निकला

कारगिल युद्ध के शुरुआती चरण में पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों ने द्रास क्षेत्र की कई ऊँची चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया था। इनमें तोलोलिंग सबसे महत्वपूर्ण थी क्योंकि यहाँ से श्रीनगर–लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-1A) पर सीधी निगरानी रखी जा सकती थी।

यदि यह चोटी लंबे समय तक दुश्मन के कब्ज़े में रहती, तो भारतीय सेना की रसद, हथियारों की आपूर्ति और सैनिकों की आवाजाही गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती थी। इसलिए इसे हर हाल में पुनः प्राप्त करना आवश्यक था।

जब कमांडर सबसे आगे चला

30 मई 1999 की रात 18 ग्रेनेडियर्स की टुकड़ी को तोलोलिंग पर हमला करने का आदेश मिला। इस अभियान का नेतृत्व मेजर राजेश सिंह अधिकारी कर रहे थे।

लगभग 15 हजार फीट की ऊँचाई, बर्फीली हवाएँ, खड़ी चट्टानें और ऊपर से दुश्मन की मशीनगनों की लगातार गोलाबारी—इन परिस्थितियों में आगे बढ़ना लगभग असंभव माना जा रहा था।

लेकिन मेजर अधिकारी ने अपने सैनिकों से पीछे रहने के बजाय स्वयं सबसे आगे बढ़कर नेतृत्व किया।

वे लगातार अपने साथियों का उत्साह बढ़ाते रहे और दुश्मन के मजबूत बंकरों पर सीधा हमला करते रहे।

गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी नहीं रुके

हमले के दौरान मेजर अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए।

इसके बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया।

उन्होंने अंतिम क्षण तक अपने जवानों को निर्देश दिए, दुश्मन की स्थिति की जानकारी साझा की और अभियान को आगे बढ़ाते रहे।

उनके नेतृत्व ने भारतीय सैनिकों का मनोबल इतना ऊँचा कर दिया कि आगे चलकर उसी क्षेत्र में निर्णायक सफलता मिली और तोलोलिंग पर भारत का तिरंगा लहराया।

एक अधूरी चिट्ठी – जो आज भी भावुक कर देती है

कारगिल युद्ध के दौरान उनकी पत्नी द्वारा भेजा गया एक पत्र उनके पास पहुँचा।

उन्होंने मुस्कुराकर अपने साथियों से कहा—

“ऑपरेशन पूरा होने के बाद इसे आराम से पढ़ूँगा।”

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

वह पत्र उनकी जेब में ही रह गया।

जब उनका पार्थिव शरीर वापस लाया गया, तब वह चिट्ठी भी उनके साथ थी।

यह घटना केवल एक सैनिक की नहीं, बल्कि उन हजारों सैन्य परिवारों की भावनाओं का प्रतीक है जो राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर देते हैं।

महावीर चक्र से सम्मानित

मेजर राजेश सिंह अधिकारी की अद्वितीय वीरता, असाधारण नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें महावीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया।

यह सम्मान केवल उनके साहस का नहीं, बल्कि उस सैन्य परंपरा का भी प्रतीक है जिसमें अधिकारी अपने सैनिकों का नेतृत्व सबसे आगे रहकर करते हैं।

युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा

मेजर अधिकारी का जीवन यह सिखाता है कि नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं, बल्कि सबसे कठिन परिस्थिति में स्वयं उदाहरण बनकर आगे बढ़ना है।

उनका जीवन अनुशासन, साहस, कर्तव्य और राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश देता है।

आज जब देश का युवा अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब मेजर अधिकारी जैसे वीर सैनिकों की गाथाएँ नई पीढ़ी में राष्ट्रसेवा की भावना जागृत करती हैं|

प्रशासन और समाज की जिम्मेदारी

कारगिल के वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल स्मरण करने से नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को समाज में जीवित रखने से होगी।

विद्यालयों, महाविद्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों में ऐसे वीरों के जीवन पर आधारित विशेष व्याख्यान, प्रदर्शनी और अध्ययन कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ समझ सकें कि आज का सुरक्षित भारत किन बलिदानों की नींव पर खड़ा है।

श्रद्धांजलि

“कुछ सैनिक इतिहास नहीं पढ़ते—वे स्वयं इतिहास बन जाते हैं।
मेजर राजेश सिंह अधिकारी ने अपने साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान से यह सिद्ध कर दिया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए दिया गया जीवन कभी समाप्त नहीं होता, वह राष्ट्र की आत्मा में सदैव जीवित रहता है।”

**जय हिंद।

वंदे मातरम्। 🇮🇳**

— श्यामल प्रतीक

कारगिल विजय विशेष श्रृंखला – “कारगिल: श्यामल प्रतीक की नज़र से

By Ashok Mishra

Ashok Mishra is the Editor-in-Chief of Chanakya News India, a Hindi digital news platform established in 2012. The organization focuses on delivering verified breaking news, live news coverage, crime, entertainment, business, technology, and regional updates across India. Address: FNG vihar 2 sector 121 Gautam budhnagar Uttar pradesh, India Email -mpcgchanakyanewsindia@gmail.com Phone– +91 9315744968