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JAISALMER  में दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस

ByNews Editor

Dec 14, 2025 #JAISALMER

चंद्र प्रकाश पुरोहित ब्यूरो JAISALMER
JAISALMER  में दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस का सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने किया शुभारंभ
– देश में बिना रुकावट न्याय दिलाने डिजिटल नीति की सख्त जरूरत: सीजेआई

JAISALMER
राजस्थान हाई कोर्ट और राजस्थान राज्य न्यायिक अकादमी ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी की JAISALMER  में दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस का शुभारंभ भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने किया। बैठक का विषय टेक्नोलॉजी के जरिए कानून का राज आगे बढ़ाना, अवसर और समस्याएं है। कॉन्फ्रेंस में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान के हाईकोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट के जज, न्यायिक अधिकारी शामिल हुए। इसका मुख्य मकसद – टेक्नोलॉजी का सही और सबको साथ लेकर चलने वाला इस्तेमाल करके न्याय तक लोगों की पहुंच को मजबूत करना है।


इस अवसर पर राजस्थान हाईकोर्ट ने कई नई डिजिटल पहल शुरू की। इन सेवाओं का मकसद नागरिकों को बेहतर सेवा देना, काम में पारदर्शिता लाना और न्याय तेजी से दिलाना है। इससे हाईकोर्ट की यह कोशिश साफ दिखती है कि वह कोर्ट तक पहुंच आसान बनाने, नियमों की रुकावटें हटाने और लोगों का भरोसा बढ़ाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करेगा।

पहले सेशन को संबोधित करते हुए सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था में डिजिटल असमानता (डिजिटल भेदभाव) के मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि यह भेदभाव केवल टेक्नोलॉजी तक पहुंच या न पहुंचने तक सीमित नहीं है बल्कि उन लोगों के बीच सबसे ज्यादा महसूस होता है। जिन्हें टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने में मदद की जरूरत होती है और जो खुद ही सब कर लेते हैं। उन्होंने साफ कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बेशक काम को आसान और तेज किया है, लेकिन ये उन लोगों को पीछे नहीं छोड़ सकते जो टेक्नोलॉजी से ज्यादा परिचित नहीं हैं। उन्होंने ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट के तीसरे चरण का जिक्र किया जिसमें पूरी तरह से कंप्यूटरीकृत कोर्ट, ई-फाइलिंग, ऑनलाइन और हाइब्रिड सुनवाई और नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के वारिए डेटा-आधारित शासन की कल्पना की गई है। उन्होंने जोर दिया कि पूरे देश में बिना रुकावट और सबको साथ लेकर न्याय दिलाने के लिए अच्छे कर्मचारियों वाले ई-सेवा केंद्र, सुहास जैसे आसान टूल, मोबाइल से पहुंच और एक राष्ट्रीय डिजिटल नीति की सख्त जरूरत है।


JAISALMER , वेस्ट जॉन रीजनल कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते मुख्य न्यायाधीश ।
JAISALMER , वेस्ट जॉन रीजनल कॉन्फ्रेंस में उपस्थित हाइकोर्ट के जज और मंचासीन भारत के मुख्य न्यायाधीश


जजों ने कहा: मानवीय निगरानी सबसे अहम
इस दौरान संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई ने सीजेआई के विचारों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी के इस दौर में इन बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। इसके साथ ही संविधान में सबको डिजिटल तरीके से शामिल करने, ग्रामीण और कमजोर लोगों को टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने में मदद देने, एआई वाले सिस्टम में इंसानों की मॉनिटरिंग, जजों और स्टाफ की ट्रेनिंग बढ़ाने पर भी चर्चा की गई।


मीडिया ट्रायल और एआई के इस्तेमाल पर सावधानी बरतनी चाहिए : जस्टिस चांदुरकर
दूसरे सेशन में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया से न्याय में आने वाली मुश्किलों पर बात हुई। जस्टिस एएस चांदुरकर ने सनस्नीखेज खबरों, गलत जानकारी और बढ़ते मीडिया ट्रायल के खतरों के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा कि संविधान में मिली । बोलने की आजादी और उस पर

ऑनलाइन विवाद समाधान से केस कम होंगे: जस्टिस भाटी
तीसरा सेशन आपसी सुलह से विवाद निपटाना और ऑनलाइन सुलह में टेक्नोलॉजी की भूमिका पर केंद्रित था। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्रसिंह भाटी ने कहा कि ओडीआर में पेंडिंग मामलों को निपटाने और काम को तेज करने की बड़ी क्षमता है। हालांकि उन्होंने एआई की मदद से होने वाले कामों में भी इंसानी निगरानी की जरूरत बताई। जस्टिस पंकज मित्तल ने जोर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत न्याय मिलना केवल कोर्ट तक पहुंचने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्याय को महसूस करने का अनुभव है। उन्होंने कहा कि एडीआर को बढ़ावा मिलना चाहिए क्योंकि यह विवाद सुलझाने का एक अच्छा और मानवीय तरीका है।


लगाए गए सही प्रतिबंधों में संतुलन बनाना होगा। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने एआई पर आंख बंद करके भरोसा न करने की चेतावनी दी। जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने सही जानकारी पर आधारित लोगों की चर्चा व रचनात्मक आलोचना पर जजों के खुलेपन के महत्व पर बोर दिया।

न्याय की प्रक्रिया में टेक्नोलॉजी मददगार
पहले दिन की बातचीत से यह साफ हुआ कि सभी जजों की एक राय है कि टेक्नोलॉजी को समावेशी, निष्पक्षता और मानवीय सम्मान के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित होकर न्याय को मदद करने वाला बनना चाहिए। राजस्थान हाईकोर्ट ने फिर से दोहराया कि वह एक ऐसी टेक्नोलॉजी-आधारित न्याय व्यवस्था बनाने के लिए प्रतिबद्ध है जो गांव और दूर-दराज के इलाके के वादियों के लिए पहुंच में आसान, जवाबदेह और लोगों के हित में हो।

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